दिल्ली में CJP के आंदोलन के दौरान कुछ प्रदर्शनकारियों, विशेषकर कुछ युवतियों, द्वारा जिस प्रकार की अशोभनीय, अश्लील और शर्मसार कर देने वाली भाषा का सार्वजनिक रूप से प्रयोग किया गया तथा हाथों से आपत्तिजनक इशारे किए गए, उसने अनेक लोगों को स्तब्ध कर दिया। यह केवल किसी राजनीतिक दल या विचारधारा का प्रश्न नहीं है, बल्कि भारतीय समाज के चरित्र और सार्वजनिक संवाद की मर्यादा का प्रश्न है। लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने, सरकार का विरोध करने और आंदोलन करने का पूरा अधिकार है। आंदोलन होने भी चाहिएं, क्योंकि वे लोकतंत्र की आत्मा हैं। किंतु कोई भी आंदोलन तभी तक सम्मान का पात्र होता है, जब तक वह अपनी मर्यादा और नैतिक ऊँचाई बनाए रखे। यदि आंदोलन का माध्यम तर्क के स्थान पर गाली, संवाद के स्थान पर अश्लीलता और विचार के स्थान पर अपमान बन जाए, तो वह अपने उद्देश्य से भटक जाता है। चाहे देश के प्रधानमंत्री हों, कोई जनप्रतिनिधि हो या एक सामान्य नागरिक—किसी के लिए भी ऐसी शर्मसार कर देने वाली गालियों और अश्लील इशारों का प्रयोग न तो भारतीय संस्कृति स्वीकार करती है और न ही एक सभ्य लोकतंत्र। असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन अमर्यादित भाषा लोकतंत्र की कमजोरी है। सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि ऐसी भाषा और ऐसे इशारे कुछ युवतियों द्वारा सार्वजनिक मंच से किए गए। जिस देश में हम “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का संकल्प लेते हैं, जहाँ नारी को संस्कृति, संस्कार और शक्ति का प्रतीक माना जाता है, वहाँ यदि कुछ बेटियाँ ही सार्वजनिक जीवन में ऐसी भाषा का प्रयोग करें, जिसे सुनकर और देखकर सामान्य व्यक्ति भी शर्मिंदा हो जाए, तो यह आत्मचिंतन का विषय है। समानता का अर्थ यह नहीं है कि अभद्रता को भी समान अधिकार मिल जाए। समानता का अर्थ है कि मर्यादा का नियम सभी पर समान रूप से लागू हो। यदि कोई पुरुष ऐसी भाषा बोले तो उसकी भी निंदा होनी चाहिए, और यदि कोई महिला बोले तो उसकी भी। किसी का लिंग नहीं, बल्कि उसका आचरण मूल्यांकन का आधार होना चाहिए। यह केवल एक आंदोलन का प्रश्न नहीं है, बल्कि परिवार, शिक्षा और सामाजिक संस्कारों का भी प्रश्न है। हमें यह सोचना होगा कि हम आने वाली पीढ़ी को कैसी सार्वजनिक संस्कृति दे रहे हैं। क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जहाँ असहमति का उत्तर गाली और अश्लील इशारों से दिया जाए, ??? सोचिये सभी…